
Micromax Raise & Fall Story
हममें से कई लोग है जो माइक्रोमैक्स को एक मोबाइल फोन निर्माता के रूप में जरूर जानते होंगे। जब 1991 में राजेश अग्रवाल द्वारा माइक्रोमैक्स की स्थापना की गई थी तो यह कभी भी एक फोन कंपनी नहीं थी। इसकी शुरुआत डेल, एचपी और सोनी जैसे विभिन्न ब्रांडों के लिए कंप्यूटर हार्डवेयर के वितरक के रूप में हुई वर्ष 2015 तक, माइक्रोमैक्स नोकिया के लिए एक आपूर्तिकर्ता से एक ऐसे ब्रांड के रूप में विकसित हो गया था जो भारतीय बाजारों में नोकिया से बड़ा था। सैमसंग के बाद माइक्रोमैक्स भारत की दूसरी सबसे बड़ी स्मार्टफोन कंपनी थी। उस समय माइक्रोमैक्स के संस्थापकों ने कंपनी का मूल्य 3.5 बिलियन डॉलर आंका था।
Micromax की बर्बादी का प्रमुख कारण
अगस्त 2014 में माइक्रोमैक्स के कॉर्पोरेट इतिहास में एक संक्षिप्त क्षण आया जब कंपनी भारत का सबसे बड़ा मोबाइल फोन ब्रांड और दुनिया में मोबाइल फोन का दसवां सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गई। 2019 तक कंपनी का मूल्यांकन 2015 के शिखर से 90% गिर गया था।
जियो की मार्केट में एन्ट्री से 5 वर्षों में ही माईक्रोमैक्स को लाइमलाइट से बाहर कर दिया
उस समय तक अधिकतर उपभोक्ताओं को 2जी से 3जी में बदलने में कई साल लग गए थे और 2015 में भी लोग 2जी नेटवर्क का उपयोग कर रहे थे।
जियो के आगमन से उद्योग जगत में क्रांति आ गई। जब जियो लॉन्च हुआ तो उसने सब कुछ मुफ्त क्र दिया।तो प्रत्येक भारतीय के पास बिना इंटरनेट के या 2जी/3जी के लिए भारी कीमत चुकाने से लेकर कई महीनों तक सीधे सबसे तेज इंटरनेट यानी 4जी मुफ्त में चलाने की स्थिति आ गई।
इसके साथ साथ कॉलें भी मुफ्त थीं क्योंकि जियो 4जी की मदद से वीओआइपी का इस्तेमाल करता था।
लेकिन दुर्भाग्य से, हर किसी के पास ऐसे फोन नहीं थे जो 4जी तक पहुंच सकें।
और तकनीक ऐसी है कि आप 3जी वाले फोन पर 4जी डेटा नहीं चला सकते। कोई भी व्यक्ति जो नए फोन की तलाश में है या ऑफर का लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है, वह ऐसा फोन खरीदेगा जिसमें 4जी होना ही चाहिए ।
माइक्रोमैक्स के लिए यहा संकट की स्थिति पैदा हो गई क्योकि उसके पास बाजार में 40 तरह के फोन मॉडल थे जिनमें से कोई भी 4जी को सपोर्ट नहीं करता था।
माइक्रोमैक्स चाहती तो मार्किट के हिसाब से अपने आप को बदल के 4 जी वाले नए फ़ोन मार्किट में ला सकती थी जिससे वह इस संकट से बच सकती थी,लेकिन अभी तक वह सिर्फ चाइना से फ़ोन लेकर उसमे अपना ब्रांड बनाकर सेल कर रहा था तो उसके पास कोई भी टेक्नोलॉजी थी ही नहीं।और जिस चाइना से वो मोबाइल खरीद रहे थे उस चाइना ने खुद ही अपना मोबाइल ब्रांड इंडियन मार्किट में उतर दिया वो भी बहुत हे कम दाम में.जिसके कारण माइक्रोमैक्स के पास कोई ऑप्शन ही नहीं बचा.
रातों-रात माइक्रोमैक्स के पास 3जी फोन का एक बड़ा स्टॉक जमा हो गया , जिसे अब कोई लेना नहीं चाहता था।
और इस तरह माइक्रोमैक्स डूब गई और जो कंपनी एक समय पूरे देश में राज कर रही थी उसका मार्केट शेयर साल के अंत तक उनकी बाजार हिस्सेदारी घटकर 9% रह गई।
हल्ला बोल एक्सप्रेस
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